Jagannath University Research Journal

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Volume-6 Issue-II

Title : विद्यार्थियों के आध्यात्मिक एवं नैतिक चरित्र निर्माण में वैदिक शिक्षा का महत्व

Author : Dr. Praveen Pathak

Keywords :

वैदिक सभ्यता, गुरुकुल, वैदिक शिक्षा, भारतीय समाज, हिन्दू संस्कृति

Abstract :

वैदिक सभ्यता विश्व की पुरानी सभ्यताओं में से एक है। वैदिक सभ्यता ने एक ओर प्राचीन सभ्यता का दर्शन करवाया वहीं दूसरी तरफ वैदिक सभ्यता ने विश्व को वैदिक शिक्षा के माध्यम से प्रकाशित किया। वैदिक शिक्षा चार हज़ार वर्षों से निरंतर प्रगति के पथ पर बढ़ती जा रही हैं। भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान तथा विभिन्न उत्तरदायितत्वों के निर्वाह के लिए शिक्षा के महत्व को सदा स्वीकार किया। वैदिक युग से ही इसे प्रकाश का पुंज माना गया जो मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को अवलोकित करते हुए सही पथ की ओर अग्रसर है। वैदिक ऋषियों का मानना था कि शिक्षा द्वारा प्राप्त एवं विकसित की गयी वृद्धि ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति होती है। वैदिक शिक्षा उस धन की भांति है कि इसे न चोर चुरा सकता है, न बाट सकता है, न छीन सकता है। वैदिक शिक्षा ऐसा प्रकाश पुंज है जो व्यव करने पर भी बराबर बढ़ता है। विद्या-संबंधी समस्त गुणों का निरूपण करने के बाद वैदिक ऋषियों ने वैदिक शिक्षा को सर्वोत्तम बताया हैं। प्राचीन भारतीयों की दृष्टि में शिक्षा मनुष्य के सर्वांगीक विकास का साधन थी। वैदिक शिक्षा मात्र पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं था अपितु मनुष्य के अध्यात्म एवं स्वास्थ्य का भी विकास करना था। वैदिक ऋषियों ने इसी को ध्यान में रखकर वैदिक शिक्षा का निर्माण किया। वैदिक शिक्षा विद्यार्थी को व्यक्तित्व के विकास का पूरा अवसर प्रदान करता है। भारतीय नीति निर्माताओं ने व्यक्तित्व को दबाने का कभी प्रयास नहीं किया। यह विद्या मनुष्य को सांसारिक जीवन की कुशलताओं में पूर्ण करके उसे जीवन यापन में मदद करती थी, पर वैदिक शिक्षा का दीर्घगामी लक्ष्य था। मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन की तैयारी, जिसके लिए उसे “परा विद्या" का अध्ययन करना होता था।

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